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संघ अर्थात् समाज-संगठन क्या ? किसलिए? और कैसे ?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने सन् 1925 में विजयदशमी के दिन की।

रा. स्व. संघ आज देश का ही नहीं अपितु विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। परन्तु फिर भी, जो लोग अभी उसके प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्पर्क में नहीं आये हैं, उन्हें उसके बारे में वास्तविक जानकारी अधिक नहीं है। अनेक लोगों के मन में तो कुछ भ्रम भी संघ के बारे,"में फैले हुए हैं। इसके दो कारण हैं: एक, संघ की कार्य-पद्धति प्रचार और जनान्दोलन की न होकर व्यक्ति व्यक्ति को, एक-एक करके, व्यक्तिगत सम्पर्क और मित्रता के द्वारा होने वाली सहज-स्वाभाविक जानकारी के साथ संगठन से जोड़ने की रही है। इससे संगठन से जुड़ने या उसके सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति ही उसे भली भाँति जान पाते थे। दूसरे, संघ के सदस्यों की, निरन्तर बढ़ती संख्या को देखकर उसकी शक्ति को अपने लिए सम्भावित संकट मानने वाले राजनीतिक लोग जानबूझकर उसके बारे में अनेक असत्य बातें गढ़कर विरोध-अभियान चलाते रहे। ऋषि-मुनियों को भी तपस्या करते देखकर इन्द्र को जैसे अपना इन्द्रासन चले जाने का भय होता था, वैसी ही पृथ्वी के राजसत्ताधारियों की स्थिति रही है। इस प्रकार स्वयं संघ द्वारा न तो

अपने बारे में प्रचार किया गया और दूसरे, मिथ्या आशंका से ग्रस्त होकर विरोधी बने राजनीतिक लोगों द्वारा उसके विरुद्ध दुष्प्रचार अभियान चलाया गया जिससे संघ के बारे में भ्रामक स्थिति बनी। इसलिए जनसामान्य को वास्तविकता का पता तभी चलता था जब वे इस संगठन को निकट से देखते था इसके सम्पर्क में आते थे।

परिचय को कमी या भ्रम को दूर करने हेतु संघ के साठ वर्ष पूरे होने और संघ-संस्थापक डॉ. हेडगेवार की जन्म शताब्दी के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने दो बड़े जन-जागरण अभियान चलाये जिनके अन्तर्गत स्वयंसेवक नगर-नगर, गाँव-गाँव जाकर लोगों से मिले, उन्हें अपना ध्येय बताया और संघ का परिचायक साहित्य दिया। इससे बहुत कुछ सही जानकारी समाज में दूर-दूर तक पहुँची। स्वयंसेवकों की नित्यप्रति बढ़ती संख्या के साथ उनके परिवारजन, मित्रवर्ग और सामाजिक सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाले लोगों का अनुपात भी समाज में बढ़ता चला गया। इसके अतिरिक्त समाज-जोवन के विविध क्षेत्रों में स्वयंसेवकों द्वारा राष्ट्र-कार्य के लिए प्रारम्भ किये गये समविचारी संगठनों जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय जनता पार्टी (पूर्वशः जनसंघ), सेवा भारती, विद्या भारती, विश्व हिन्दू परिषद्, स्वदेशी जागरण अधिक लोग संघ की ओर आते जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक एवं अन्य आपदाओं के समय स्वयंसेवकों द्वारा किये जाने वाले सेवा कार्य भी लोगों की दृष्टि में आते हैं।

मंच, भारतीय किसान संघ इत्यादि के भी सम्पर्क और सहयोग से अधिक से

इन सब बातों से संघ के विरोध में फैलाया गया भ्रम कम होता जा रहा है और उसके साथ ही संघ के बारे में लोगों की जिज्ञासा बढ़ रही है। अब संघ से अनभिज्ञ लोग भी यह जानना चाहते हैं कि संघ वास्तव में क्या है जो आज यह राष्ट्र की बहुत बड़ी सृजनात्मक शक्ति बनकर सामने खड़ा है?

प्रेरणा-स्रोत
संघ-संस्थापक डॉ. हेडगेवार पर बाल्यकाल से ही छत्रपति शिवाजी के जीवन और कर्तृत्व का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था। ऐसा ही एक प्रसंग इस प्रकार है :
शिवाजी के पिता शहाजी भौंसले एक जागीरदार थे और परिस्थितिवश बीजापुर के आदिलशाही दरबार में सेवारत थे। बालक शिवाजी अपनी माता जिजाबाई के पास पुणे में रहते थे जहाँ दादाजी कौण्डदेव की देखरेख में उन्हें शिक्षा दी जा रही थी। पिता से भेंट करने शिवाजी बीजापुर गये तो शिष्टाचार के नाते वह शिवाजी को आदिलशाही दरबार में ले गये। वहाँ दरबार की प्रथा के अनुसार शहाजी ने शिवा से आदिलशाह के सामने सिर झुकाकर अभिवादन करने को कहा तो दस वर्ष के शिवा ने उत्तर दिया कि मैं अपने देश पर अवैध शासन जमा कर बैठे किसी विदेशी को अपना राजा नहीं मान सकता और इसलिए उस का अभिवादन भी नहीं कर सकता। यह सुनकर सभी स्तब्ध रह गये। शहाजी अपने पुत्र को अबोध बालक कहकर तुरन्त बाहर ले गये जिससे वह आदिलशाह के क्रोध से बच जाये। शिवाजी के भावी जीवन का यह दिशा-संकेत था और देशभक्तों की भावी पीढ़ियों का दीपस्तम्भ।

नागपुर के एक वेदपाठी परिवार के धार्मिक वातावरण में जन्मे और पले बालक केशव की चेतना को शिवाजी के जीवन के ऐसे ही प्रेरक प्रसंगों ने झकझोर कर जगा दिया था। उसने किसी भी विदेशी को अपने देश का शासक न स्वीकार करने का संकल्प कर लिया। परन्तु इसके साथ ही विदेशियों के बारे में सक्रिय हुआ केशव का मन-मस्तिष्क एक गंभीर प्रश्न से व्यग्र हो उठा। पूर्वजों के शौर्य की अनेक कहानियाँ वे सुन चुके थे। अतः उनका मन यह सोचकर व्यथित हो उठा कि शूरवीरों से भरे हमारे इतने बड़े देश पर विदेश से आये मुट्टी भर आक्रमणकारी कैसे आधिपत्य स्थापित कर पाये ? उस समय किसी का भी उत्तर उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर सका। आगे चलकर, राष्ट्रीय पराभव की इस समस्या का निदान और निवारक उपाय तो नियति उन्हीं से करवाने वाली थी। उस समय भले ही उन्हें अपने प्रश्न का समुचित उत्तर नहीं मिला, तो भी उसने उनके जीवन को विचार की एक ऐसी दिशा में मोड़ दिया जिससे बाल्यावस्था से ही वह स्वाधीनता-संघर्ष के प्राय: सभी रूपों और प्रयत्नों से जुड़ते चले गये। वे क्रान्तिकारी भी बने और फिर आन्दोलनकारी बनकर कारागार भी गये, परन्तु देश की पराधीनता का वह प्रश्न उनके मस्तिष्क से कभी ओझल नहीं हुआ और अन्ततः उसका निदान-समाधान उन्होंने ढूँढ ही लिया।

पराधीनता का दंश

भारत में 1947 के पश्चात् जन्मे लोगों ने भले ही एक खण्डित किन्तु स्वतन्त्र देश में आँखें खोली हों, परन्तु उससे पूर्व लगभग एक हजार वर्षों तक इस देश को पराधीनता की कष्टपूर्ण व्यवस्था भोगनी पड़ी, बर्बर अत्याचार और अमानवीय शोषण सहन करना पड़ा। इस्लामी आक्रमणकारियों के दमनकारी शासन के साथ शताब्दियों तक संघर्ष के पश्चात् पूर्ण स्वतन्त्रता के लिए परिस्थिति अनुकूल बनती दिखाई दी तो अंग्रेजों ने उस सम्भावना को समाप्त कर दिया। पराधीनता और विस्तृत हो गयी। अन्तर इतना ही पड़ा कि क्रूर बर्बरता का स्थान विधानपरक (कानून बनाकर) शोषण ने ले लिया। उस पराधीनता के विरुद्ध देशप्रेमी व स्वाभिमानी भारतीयों ने अविराम संघर्ष किया, परन्तु वैसी राष्ट्र-चेतना यदि सभी देशवासियों में होती तो देश कभी पराधीन ही न होता। अतएव स्वाधीनता-संघर्ष में गहरे उतरने के साथ-साथ डॉ. केशवराव हेडगेवार का मानस उस कारण का निवारण ढूँढने में भी लगा, जो देश की परतन्त्रता के लिए उत्तरदायी था और इसी चिन्तन-मनन का प्रतिफल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में प्रकट हुआ।

वही प्रश्न अब उत्तर के साथ

डॉ. हेडगेवार सभाओं में लोगों से प्रश्न करते थे "हमारा इतना प्राचीन और महान् राष्ट्र उत्तम गुणों से सम्पन्न होते हुए भी बार-बार पराधीन कैसे होता रहा ? मुट्ठी भर विदेशी इतने बड़े देश पर अपनी सत्ता कैसे थोप पाये ?" हमारे देश में बल, बुद्धि, धन, धर्म, संस्कृति किसी बात की कमी नहीं थी, फिर भी देश पराधीन हुआ। यह इसलिए हुआ क्योंकि हममें राष्ट्र भावना का अभाव था। हमारे अपने समाज के ही बल, बुद्धि, धन और श्रम का उपयोग विदेशियों ने इसी समाज को अपना दास बनाने के लिए किया। आखिर भारत में अंग्रेजों के प्रशासन को चलाता कौन है? हमारे ही भाइयों के हाथों में लाठी देकर विदेशियों ने हमारे सिर फुड़वाये।"

"क्यों हुआ यह सब ? कारण सीधा सा है हमारे समाज की असंगठित अवस्था। हमारे आपसी कलह का ही लाभ विदेशियों ने उठाया। करोड़ों शूरवीरों का देश विदेशी आक्रमण के सामने सुसंगठित सेना नहीं जुटा पाता था। हम अपने समाज, अपने राष्ट्र में परस्पर बन्धुभाव व एकता नहीं रख सके। परिणाम यह हुआ कि बारी-बारी से सभी पिटे। भयानक अत्याचार हुए, बलपूर्वक लोगों का धर्म छीनकर उन्हें विधर्मी बनाया गया। अत्यंत उन्नत, प्राचीन संस्कृति वाले महान राष्ट्र की ऐसी दुर्दशा हुई क्योंकि हमने अपने सामाजिक संगठन की उपेक्षा कर दी। समय के साथ उसमें आ गयी विसंगतियों को सुधारने पर हमने समुचित ध्यान नहीं दिया। हमारी 'मिलकर चलें, मिलकर बोलें' की वैदिक समुदाय भावना व्यक्तिवादी आग्रहों से छिन्न-भिन्न हो गयी।"

अतएव स्वाधीनता-संघर्ष के अनेक अनुभवों सहित परिस्थिति के गहन विश्लेषण और सोच-विचार के पश्चात् डॉ. हेडगेवार ने भारत की स्वाधीनता के लिए प्रयास के साथ-साथ उस स्वतंत्रता को स्थायित्व प्रदान करने तथा भारत को परम वैभव-सम्पन्न अजेय राष्ट्र बनाने के लिए यहाँ के राष्ट्रीय समाज को संगठित करने का दायित्व हाथ में लिया।

संगठन-बल

संगठन क्या है? इसे स्पष्ट करते हुए डॉ. हेडगेवार ने कहा- "किसी भी राष्ट्र का सामर्थ्य उसके संगठन के आधार पर निर्मित होता है। बिखरा हुआ समाज तो एक जमघट मात्र है। 'जमघट' और 'संगठन' दोनों शब्द समूहवाचक हैं, फिर भी दोनों का अर्थ भिन्न है। जमावड़े में अलग-अलग वृत्ति के और परस्पर कुछ भी सम्बन्ध न रखने वाले लोग होते हैं, किन्तु संगठन में अनुशासन, अपनत्व और समाज हित के सम्बन्ध सूत्र होते हैं जिनमें अत्यधिक स्नेहाकर्षण होता है। परन्तु जिस पदार्थ के अणु संगठित नहीं होते, उसका नाश शीघ्र होता है। यह सीधा-सरल तत्त्व ध्यान में रखकर समाज को संगठित और शक्तिशाली बनाने के लिए संघ ने जन्म लिया है।"

संगठन-बल किसलिए ?

डॉक्टर जी कहते हैं- "दुर्बल को सबल से छिपकर रहना पड़ता है अथवा उसके चंगुल में फँसकर उसका दास बनकर जीवन बिताना पड़ता है। इसके लिए सबल को दोष देने का कोई अर्थ नहीं। शक्तिवान और महत्त्वाकांक्षी को आक्रामक बनने के लिए प्रोत्साहन या प्रेरणा कौन देता है? दुर्बल समाज। दुर्बलता महापाप है। विश्व के ऊपर मँडराने वाली विभिन्न विपत्तियों का सामना करने के लिए बलिष्ठ व संगठित समाज ही उपाय है।

हमें दूसरों पर आक्रमण करने, उन्हें समाप्त करने या उनकी सम्पत्ति हड़प कर धनी बनने के लिए संगठन नहीं करना है। वह दूसरों की अन्यायपूर्ण व आक्रामक वृत्ति को नष्ट करने के लिए होगा। आक्रमण रूपी महामारी के लिए संगठन एक रोग-निवारक टीका है।..... यदि अन्य समाज हमारे ऊपर आक्रमण नहीं करेंगे तो हमारी शक्ति से उन्हें कोई बाधा नहीं पहुँचेगी। अतः संघ का ध्येय अपने धर्म, अपने समाज और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए

संगठन कार्य क्या है?

भारतीय समाज-व्यवस्था में समाज की इकाई परिवार है। इसलिए यहाँ समाज-संगठन का मूल तत्त्व है परिवार भावना। जितनी विकसित और व्यापक परिवार-भावना होगी, उतना ही सुसंगठित समाज होगा क्योंकि सारा समाज मनुष्य का विशाल परिवार ही तो है। परन्तु कुछ लोग मानते हैं कि मनुष्य का परिवार उसे संकीर्ण-बुद्धि और स्वार्थी बना देता है क्योंकि उसके कारण वह समाज के प्रति अपने कर्तव्य को भूलकर परिवार हित में ही, उलझा रहता है। वास्तव में परिवार व्यष्टि (व्यक्ति) से समष्टि की ओर यात्रा का प्रथम पड़ाव है। उस ध्येय की प्राप्ति में व्यवधान तब आता है जब व्यक्ति अपनी यात्रा के प्रथम पड़ाव को ही अन्तिम गन्तव्य मान बैठता है।

उसकी इस भूल को सुधार कर उसे आगे बढ़ाना-पूरे समाज और मानवता के हित के बारे में भी परिवार की ही भाँति सोचने के लिए प्रवृत्त करना-यही संगठन कार्य है। इस सम्बन्ध में संघ-संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का कहना था कि एक भारवाहक (कुली) या श्रमिक जो अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए बोझ ढोता है, वह स्वार्थी नहीं हो सकता। स्वार्थी होता तो केवल अपना पेट भरने की सोचता और शेष समय आराम करता। परन्तु वह परिवार के अन्य सदस्यों का भी पोषण करने के लिए कठिन परिश्रम करता है और यह सब वह उन पर उपकार करने की भावना से भी नहीं करता, उनके प्रति आत्मीयभाव (अपनापन) होने के कारण करता है। ऐसे व्यक्ति को स्वार्थी या संकीर्ण मानसिकता वाला कहना उचित नहीं है। दूसरों के लिए त्याग करने की और अपनेपन की भावना तो उसमें सदा से है, आवश्यकता है उस भावना को व्यापक बनाने की जो आत्मीयता उसमें अपने सीमित परिवार के लोगों के प्रति है, उसे विस्तार देकर सभी समाज बन्धुओं या देशबान्धवों तक बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसे स्वस्थ, सुविकसित, व्यापक बन्धुभाव को समूचे राष्ट्रीय समाज तक ले जाने की योजना डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से की। देशभूमि के प्रति श्रद्धा, मातृभाव और समाज में सभी के प्रति आत्मीय बन्धुभाव विकसित कर प्रत्येक परिस्थिति का सामना एक होकर करना ही समाज संगठन है। यही संघ-कार्य है।
व्यापक प्रयत्न से ही सफलता
परन्तु डॉ. हेडगेवार ने कहा- "यह काम एक-दो या पाँच-दस अथवा पच्चीस-पचास लोगों का नहीं है। मनुष्य कितना भी कर्तृत्ववान्, कर्मशील और शक्तिमान हो, उसकी शक्ति की एक सीमा होती है। पूरे राष्ट्र का काम वह अकेले अपने सिर पर नहीं ले सकता। इस काम के लिए पूरे राष्ट्र को संगठित होना होगा। जो शक्तिहीन है वह धर्म की रक्षा नहीं कर सकता। इसीलिए सारे समाज को संगठित कर बलशाली बनाने का काम संघ ने अफ्ने हाथ में लिया है। यही हमारा आज का धर्माचरण है। इसके अतिरिक्त अन्य ध्येय हमारी दृष्टि में गौण हैं।"

अलग (नया) संगठन क्यों ?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना से पूर्व डॉ. केशवराव हेडगेवार अपनी किशोर और तरुणावस्था में महाराष्ट्र तथा बंगाल के क्रान्तिकारी संगठनों के सदस्य रह चुके थे। तत्पश्चात् युवावस्था में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता एवं प्रान्तीय पदाधिकारी के रूप में देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होंने प्रखर भूमिका निभायी। वहाँ भी उन्हें अलग संगठन बनाना आवश्यक क्यों लगा ?

इसका कारण था डॉ. हेडगेवार का मूलगामी चिन्तन। जैसे मार्क्सवाद के अनुसार, मानव-समाज की सब समस्याओं का मूल कारण आर्थिक है। आर्थिक विषमता दूर होते ही समाज और व्यक्ति के जीवन के सभी पक्ष स्वयं ठीक हो जायेंगे, उसी प्रकार उन दिनों भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के अधिकांश नेता कहते थे कि हमारी सभी समस्याओं का कारण हमारी पराधीनता है, स्वतन्त्र होते ही ये समस्याएँ स्वतः सुलझ जायेंगी। किन्तु डॉ. हेडगेवार ऐसा नहीं मानते थे। यद्यपि उनकी स्वतंत्रता की कामना आन्दोलनकारी नेताओं से कहीं अधिक तीव्र थी, वे तो उग्र क्रान्ति-मार्ग के पथिक रह चुके थे और बाद में भी क्रान्तिकारियों से उनका सहयोग सम्बन्ध बना रहा, फिर भी वे समझते थे कि हमारी सभी समस्याओं का एकमात्र कारण हमारी पराधीनता नहीं है। इसके विपरीत, हमारे समाज जीवन में आयी कतिपय न्यूनताओं के कारण हम पराधीन हुए और उन दोषों-दुर्बलताओं को दूर किये बिना यदि हम स्वतन्त्र हो भी गये, तब भी अपनी स्वतन्त्रता को दुबारा गँवा सकते हैं। इसके विपरीत, यदि हम में स्वतन्त्र रहने की पात्रता आ जाये तो फिर हमें कोई परतन्त्र नहीं रख सकेगा। अतः स्वतन्त्र होने के लिए प्रयत्न करने के साथ-साथ स्वतन्त्र रह पाने की योग्यता अर्जित करना और भी आवश्यक है तथा वह योग्यता सारे राष्ट्र को एक संगठन-सूत्र में गूँथने और अपनी संस्कृति, अपने आदर्शों एवं जीवन-मूल्यों के प्रति गौरव बोध जागृत करने से ही आ सकती है। स्वाभिमान से जीने के लिए दो बातें आवश्यक हैं- अपने आदर्शों की रक्षा के लिए प्राण भी अर्पित करने की तत्परता और संगठित एकता का बल।

निहित उद्देश्य से प्रेरित प्रचार से प्रभावित होकर कभी-कभी कुछ लोगों को भ्रम हो जाता है कि संघ की स्थापना मुसलमानों के विरुद्ध की गयी है। ऐसी ही शंका प्रकट किये जाने पर दूसरे सरसंघचालक श्री गुरुजी ने कहा था- "यदि पैगम्बर मुहम्मद साहब का जन्म न भी हुआ होता और इस्लाम अस्तित्व में ही न आया होता, तब भी यदि हम अपने समाज को ऐसी ही असंगठित अवस्था में पाते जैसा कि यह आज है तो हम इसी प्रकार संगठन कार्य कर रहे होते जैसे अब कर रहे हैं।" अतः संघ की स्थापना का कारण समाज का असंगठित अवस्था में होना है और यह असंगठित मुसलमानों के कारण ही नहीं हुआ है। वास्तविकता यह है कि शक, हूण, यवन और इस्लामी आक्रमणकारी या अंग्रेज जितनी भी सफलता यहाँ प्राप्त कर पाये, वह सम्भव ही इसलिए हुआ कि यहाँ का समाज अपनी प्राचीन संगठन शक्ति को भुला बैठा था।

यह ठीक है कि भारत को स्वराज्य प्रदान करने के प्रश्न पर अंग्रेजों द्वारा चालाकी से थोपी गयी हिन्दू-मुस्लिम एकता की शर्त मान लेने के बारे में डॉ. हेडगेवार गांधी जी से सहमत नहीं थे, क्योंकि उस स्थिति में अंग्रेज अपनी कूटनीति से वह एकता कभी होने ही नहीं देते और स्वराज्य 'न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी' की कहावत के अनुसार मात्र कल्पना बनकर रह जाता। उन दिनों अंग्रेजों की चाल में आकर कांग्रेस मुसलमानों को अपने साथ लाने के लिए जो भी विशेष सुविधा देती थी, अंग्रेज शासक उससे बड़ा लोभ दिखाकर फिर उन्हें दूर खींच लेते थे। इस प्रकार कांग्रेस एक अन्धी दौड़ में फँस गयी थी जिसका न कोई अन्त था, न ही कोई लाभ। उसमें पराजय ही उसकी नियति हो सकती थी जिसकी पराकाष्ठा अन्त में मातृभूमि का विखण्डन स्वीकार कर लेने में हुई। इसलिए डाक्टर हेडगेवार ने उन लोगों को संगठित करने का मार्ग चुना जो इस देश में स्वयं को आक्रमणकारी नहीं वरन् इस भूमि की सन्तान मानते हैं। यदि राष्ट्रीय समाज संगठित और बलशाली होगा तो सभी समुदायों को स्वयं ही उसके साथ मेल करने की इच्छा होगी। संघ-स्थापना में यह सकारात्मक दृष्टि रही है।

संगठन का सूत्र-दीप से दीप प्रज्ज्वलन

व्यक्ति-व्यक्ति से सम्पर्क कर इसी प्रकार दीप से दीप जलाने की कार्य-पद्धति डॉ. हेडगेवार ने संघ में अपनायी जिससे स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ती चली गयी- स्वयंसेवक बढ़े, शाखाएँ बढ़ीं, संघ-कार्य का विस्तार करने वाले कार्यकर्त्ता बढ़े। संघ का संगठन-प्रवाह नागपुर में डॉ. हेडगेवार के घर की बैठक से आरम्भ होकर विभिन्न प्रांतों, प्रदेशों से होता हुआ पूरे देश में फैल गया।

अनोखी शैली

डॉक्टर जी ने नये-नये लोगों को संघ से जोड़ने की बहुत सरल, किन्तु चमत्कारी पद्धति अपनायी। उन्होंने अपनी बात समझाने के लिए बड़ी सभाएँ आयोजित कर व्याख्यान देने का मार्ग नहीं अपनाया। उनकी अपनी शैली. थी- सामान्य जान-पहचान को गहरे परिचय और आत्मीयता में परिवर्तित करने की। वे छोटी-छोटी बैठकों में बातचीत और हास्य-विनोद करते हुए अपनी बात श्रोताओं के मस्तिष्क में बिठा देते थे। किन्तु ऐसा नहीं कि जिसने संगठन की यह बात समझ ली, वह मानसिक रूप से सहमत होकर फिर . पहले जैसा ही निष्क्रिय होकर बैठा रहे। डाक्टर जी इस प्रकार से व्यक्ति. निर्माण करते थे कि संगठन, उसकी जीवन-शैली और संगठन का विस्तारु उसका जीवन-व्रत बन जाये। और यही संघ की कार्य-पद्धति बन गयी जिसका स्वरूप निखारते चलना डाक्टर जी के अनुयायियों और उत्तराधिकारियों का जीवन ध्येय बन गया।

शाखा पद्धति और स्वयंसेवक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाज संगठन की एक विशिष्ट कार्य-पद्धति विकसित की है जो अत्यन्त सरल होते हुए बहुत सफल सिद्ध हुई है। इसे शाखा-पद्धति कहते हैं।

संघ-कार्य की इकाई उसकी शाखा अर्थात् दैनिक मिलन का कार्यक्रम है। संघ की गतिविधियों में निष्ठापूर्वक भाग लेने वाला प्रत्येक सदस्य स्वयंसेवक कहलाता है। स्वयंसेवक से यह अपेक्षित है कि वह अपनी सामान्य दिनचर्या में से प्रतिदिन कम से कम एक घंटा संघ-शाखा के लिए निकाले। शाखा नित्य नियम से एक नियत स्थान पर, जिसे संघ-स्थान कहते हैं, नियत समय पर लगायी जाती है। किसी मैदान या अन्य सुविधाजनक स्थान पर प्रतिदिन प्रातःकाल या सायंकाल (परिस्थिति को देखते हुए कहाँ रात्रि में भी) आसपास के स्वयंसेवक एकत्र होते हैं। भगवा ध्वज का आरोहण कर उसका वन्दन और फिर कुछ व्यायाम या शारीरिक प्रशिक्षण, खेल, राष्ट्र या समाज से सम्बन्धित कोई चर्चा, प्रश्नोत्तर अथवा देशभक्ति-गीत का गायन इत्यादि सहज भाव से किन्तु अनुशासनपूर्वक सम्पन्न होते हैं और अन्त में मातृभूमि तथा ईश्वर की वन्दना करते हुए प्रार्थना करके शाखा का विसर्जन होता है।
यहाँ खेल-खेल में और सहज चर्चाओं द्वारा संगठन, अनुशासन और देशभक्ति के पाठ तो स्वयंसेवक सहजता से सीख ही जाता है, साथ ही आदर्श नागरिक के जो संस्कार उसके मन पर पड़ते हैं उनसे उसका मनोबौद्धिक स्तर भी उन्नत, परिष्कृत और उदात्त बनता चला जाता है। स्वदेश के लिए मातृभूमि (माता) का भाव और साथी स्वयंसेवकों के प्रति बन्धुभाव एवं प्रेम उसके हृदय में अंकुरित होता है। उनके तथा उनके परिवारों के सुख-दुःख में सहभागी होने, समूचे संगठन और पूरे राष्ट्रीय समाज को अपना बड़ा परिवार अनुभव करने तथा राष्ट्र पर सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए तत्पर रहने का जो स्वभाव उसमें इस विशिष्ट संगति के परिणामस्वरूप विकसित होता है, उससे वह मानो एक नया ही व्यक्ति बनकर उभरता है। उसके जीवन को एक उच्च ध्येय प्राप्त हो जाता है। यही संघ द्वारा व्यक्ति-निर्माण या चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया है।
स्वयंसेवकों में स्वावलम्बी स्वभाव निर्मित करने और समानता का भाव जगाने के लिए उन्हें अपना काम स्वयं करने की आदत डोली जाती है। शिविरों या शिक्षा-वर्गों में वे भोजन बनाने और परोसने जैसे कार्यों में बारी-बारी से हाथ बंटाते हैं तथा अपने बर्तन स्वयं माँजते हैं। इससे सामूहिक रूप से कार्य करने का अभ्यास तो होता ही है, समय पड़ने पर स्वयंसेवक किसी भी काम को करने में संकोच नहीं करते। सभी स्वयंसेवकों का एक ही पंक्ति में प्रेमपूर्वक बैठकर भोजन करना संघ में नित्यव्यवहार की सामान्य बात है। जाति या वर्ण भेद तथा ऊँच-नीच की तो यहाँ किसी को कल्पना भी नहीं आती। यही देखकर महात्मा गाँधी ने एक बार कहा था- 'मैं जो करना चाहता था वह कार्य संघ ने चुपचाप कर दिखाया है।' डॉ. भीमराव अम्बेडकर भी इसी कारण संघ की ओर आशाभरी दृष्टि से देखते थे।

संघ-प्रवेश
जैसे शाखा की कार्य-पद्धति सरल है, वैसे ही स्वयंसेवक बनना भी बहुत सरल है। संघ में प्रवेश के लिए सदस्यता की कोई जटिल प्रक्रिया नहीं है। यदि आप भारत को अपनी मातृभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि मानते हैं तथा भारतीय संस्कृति में आस्था रखते हैं तो शाखा के समय निस्संकोच संघ-स्थान पर (जहाँ शाखा लगती है) चले जाइये और वहाँ के अनुशासन, एवं निर्देशों का पालन करते हुए शाखा के कार्यक्रमों में भाग लीजिये। फिर
भी जिन्हें कोई शंका हो, वे वहाँ विद्यमान वरिष्ठ कार्यकताओं से उस सम्बन्ध में पूछ सकते हैं अथवा कुछ दिन दूर से शान्तिपूर्वक वहाँ की गतिविधियों का अवलोकन कर सकते हैं।

कार्यकर्त्ता
एक कार्यकर्ता के लिए प्रतिदिन एक घंटा राष्ट्र-कार्य के लिऐ देने की आवश्यकता न्यूनतम है, सम्पूर्ण नहीं। वाञ्छनीय तो यह है कि धीरे-धीरे उसकी जीवन पद्धति ही संगठनमयी बनती चली जाये। समाज संगठन कोई तदर्थ (ad-hoc) कार्य नहीं है कि कुछ दिन जैसे-तैसे चला लिया। यदि संसार में अजेय राष्ट्र बनकर जीना है तो हमें संगठित रहने का स्वभाव ही बना लेना पड़ेगा। रा. स्व. संघ अन्य बहुत से संगठनों की भाँति समाज के अन्दर एक संगठन नहीं है क्योंकि सघ का उद्देश्य सम्पूर्ण समाज को संगठित करना है, समाज के अन्दर एक और संगठन बनाना नहीं अब इतना बड़ा कार्य तभी पूरा हो सकता है जब उसे जीवन-कार्य के रूप में लिया जाये। संघ-कार्य इतना विस्तृत हुआ है तो इसलिए कि उसमें पूरी शक्ति से कार्य करने और अन्य दायित्वों का भी निर्वाह करते हुए यथासम्भव कार्यरत रहने वाले कार्यकर्त्ताओं की कमी नहीं रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पूर्ण तन्त्र का आधार वे जीवनव्रती कार्यकर्ता हैं जिन्हें 'प्रचारक' कहते हैं। वे पारिवारिक दायित्वों से मुक्त रहकर अपने जीवन की समस्त गतिविधियाँ संघ के लिए ही अर्पित करने का संकल्प करके संगठन-कार्य में जुटे हैं। वे प्रचलित धार्मिक दृष्टि से संन्यासी नहीं होते, परन्तु राष्ट्र-कार्य में कोई बाधा न आये, इसलिए वे परिवार नहीं बसाते हैं। उनका सब कुछ राष्ट्रदेव को समर्पित होता है। संघ के प्रचारक - वस्तुतः संगठनकर्ता हैं। यहाँ प्रचार का अर्थ है व्यक्ति-व्यक्ति के मन में स्वदेश, स्वराष्ट्र और अपने समाज के लिए प्रेम जगाकर उसे संगठन के साथ जोड़ना और राष्ट्र-कार्य में लगने के लिए प्रेरित करना। समूचा संघ-तंत्र इसी कार्य के लिए बना है।
आजीवन प्रचारकों के अतिरिक्त कुछ लोग जीवन के कुछ वर्ष सम्पूर्णतः संघकार्य के लिए समर्पित करते हैं। उस अवधि में वे प्रचारक ही कहलाते हैं। उसके पश्चात् जब वे सामान्य गृहस्थ जीवन अपना लेते हैं तो अन्य स्वयंसेवकों की भाँति ही पर्याप्त समय संघ-कार्य के लिए देते हैं। यह त्याग ही, जो किसी पर उपकार नहीं अपितु अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालनमात्र है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वास्तविक शक्ति है। यही कारण है कि विभिन्न प्रकार के दुष्प्रचार के बावजूद भी यह संगठन निरन्तर समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाये हुए है।

प्रशिक्षण
शाखा में व्यायाम, खेल, योगासन, लाठीचालन, पथ संचलन इत्यादि विविध प्रकार के शारीरिक और चर्चा, प्रश्नोत्तर इत्यादि के माध्यम से बौद्धिक प्रशिक्षण तो स्वयंसेवकों को प्राप्त होता ही है, कुछ अधिक दक्षता के लिए तीन दिन से लेकर अधिकतम एक सप्ताह के प्राथमिक शिक्षा वर्ग भी लगाये जाते हैं। किन्तु सघन प्रशिक्षण द्वारा विशेष प्रशिक्षित कार्यकर्ता तैयार करने के लिए प्रतिवर्ष ग्रीष्म ऋतु में लगभग एक मास की अवधि (अब घटाकर 20 दिन) के संघ-शिक्षा वर्ग आयोजित किये जाते हैं जिनमें शिक्षार्थियों को उस पूरी अवधि में वहीं रहना होता है। प्रशिक्षण के बाद शारीरिक और बौद्धिक, दोनों प्रकार की परीक्षाएँ भी ली जाती हैं। उत्तरोत्तर प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लेने पर कार्यकर्ता पूर्ण प्रशिक्षित माना जाता है।

संगठन-तन्त्र
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठन-तन्त्र त्रिवेणी में गुथाँ हुआ है जिसमें एक धारा शाखा-कार्यवाह और मुख्य शिक्षक से प्रारम्भ करके उत्तरोत्तर कार्यवाहों की है। दूसरी प्रचारकों की तथा तीसरी संघचालकों की श्रेणी है किन्तु शीर्ष पर सभी का त्रिवेणी संगम हो जाता है। शाखा-स्तर पर अधिक से अधिक स्वयंसेवकों को नियमित रूप से शाखा में आने की प्रेरणा देने के लिए गटनायक (टोलियों के नेता) होते हैं। शाखाओं के समूह (मण्डल) की देखरेख का दायित्व मण्डल कार्यवाह का होता है। कार्यवाह का अर्थ है कार्यकारी अधिकारी या सचिव। इसी प्रकार मंडल से बड़ी इकाई के लिए ग्रामीण क्षेत्र में खण्ड-कार्यवाह और तहसील कार्यवाह होते हैं तथा नगर-क्षेत्र में नगर-कार्यवाह। तत्पश्चात् जिला, विभाग, संभाग, प्रान्त और क्षेत्र के कार्यवाह अपनी-अपनी भौगोलिक इकाई में दायित्व वहन करते हैं। यह एक धारा है। दूसरी धारा संगठनकर्ताओं की है जो खण्ड प्रचारक और तहसील प्रचारक या नगर प्रचारक से लेकर जिला, विभाग, संभाग, प्रान्त और क्षेत्र प्रचारकों तक जाती है। प्रचारकों की ही भाँति तीसरी धारा में तहसील या नगर से लेकर क्षेत्र तक के संघचालक आते हैं जो संघ गतिविधियों की अध्यक्षता करने के लिए मनोनीत सम्मानित नागरिक होते हैं। इस सारी संरचना के प्रशासनिक शीर्ष पर सरकार्यवाह का पद है। सरकार्यवाह की नियुक्ति संगठनात्मक चुनाव द्वारा एक निश्चित अवधि (तीन वर्ष) के लिए होती है।
संगठन के सर्वोच्च मार्गदर्शक सरसंघचालक कहलाते हैं जो अपने पूर्ववर्ती द्वारा संगठन के वरिष्ठजनों से परामर्श करके मनोनीत किये जाते हैं तथा वे तब तक पद पर बने रहते हैं जब तक स्थान रिक्त होने का कारण न उपस्थित हो जाये।
केन्द्रीय स्तर पर संगठन और प्रशासन की दृष्टि से दो संस्थाएँ हैं अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा और अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल । इनका वर्ष में एक-एक बार अधिवेशन होता है।
संघ-कार्य की दृष्टि से पूरे देश में 41 प्रान्त बनाये गये हैं जिनमें कुल मिलाकर वर्तमान में 57 हजार शाखाएँ चल रही हैं।

सतत विकास-परिवर्तन के साथ निरन्तरता
संघ की सम्पूर्ण कार्यपद्धति जैसी आज है, वह सब पूर्वनिश्चित करके आरम्भ में ही कोई संविधान और लिखित नियम-उपनियम बनाकर 1925 में उसे प्रारम्भ किया गया, ऐसा नहीं है। प्रारम्भ में तो 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ. हेडगेवार ने अपने घर पर ही 15-20 लोगों के साथ बैठक (गोष्ठी) करके संघ प्रारम्भ करने की घोषणा मात्र की और फिर सभी ने उस पर विचार-विमर्श किया। उसके पश्चात् भी स्वयंसेवक पहले की तरह, व्यायाम करने के लिए व्यायामशालाओं (अखाड़ों) में जाते थे, पहले नागपुर व्यायामशाला में और फिर महाराष्ट्र व्यायामशाला में। जैसे-जैसे स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ी तथा शाखाओं का विस्तार हुआ वैसे-वैसे कार्यपद्धति का भी व्यावहारिक विकास होता गया और उसमें परिपूर्णता आने लगी।
'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' नामकरण 17 अप्रैल 1926 की एक बैठक में हुआ। 19 दिसम्बर 1926 को डॉ. हेडगेवार सर्वसम्मति से संघ-प्रमुख चुने गये। निरन्तर बढ़ते संगठन कार्य को सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिए नवम्बर 1929 में वह सरसंघचालक बनाये गये और देश की समस्त शाखाएँ उन्हीं के मार्गदर्शन में चलाने का निश्चय किया गया। संघ में प्रचारक-पद्धति और वार्षिक शिक्षा वर्गों का चलन कुछ वर्षों के पश्चात् प्रारम्भ हुआ। जब संघ महाराष्ट्र की सीमा से बाहर निकलकर देशव्यापी होने लगा तो मराठी और हिन्दी की मिली-जुली आरम्भकालीन प्रार्थना के स्थान पर 1939 में संस्कृत में नयी प्रार्थना की रचना की गई जिसे 1940 से अपना लिया गया।
अभिप्राय यह है कि एक ध्येय निश्चित करके तब तक के अनुभव के आधार पर जब पग आगे बढ़े तो मार्ग भी बनता चला गया। इस सफल विकास को देखते हुए अब भली भाँति उजागर हो गया है कि जो लक्ष्य और उसकी प्राप्ति के प्रयत्न करने की जो दिशा डाक्टर जी ने निश्चित की थी, वे दोनों ही कितने सही थे। इससे अपने ध्येय पर आस्था और भी दृढ़ होती है। इस विकास-यात्रा से यह भी प्रकट है कि रा. स्व. संघ जड़ मान्यताओं या रूढ़ियों से बँधा न होकर एक सतत विकासमान प्रगतिशील संगठन है। इस विकास का स्वरूप है- परिवर्तन के साथ निरन्तरता। ध्येय वही, दिशा वही, किन्तु पाँव निरन्तर नयी भूमि को नापते हुए सतत आगे ही आगे। परिवर्तन के साथ निरन्तरता की यही भागीरथी डॉ. हेडगेवार के जीवन में भी दिखाई देती है जिसका अनुवर्तन अलग से करने की आवश्यकता है।

राष्ट्र जीवन में संघ की भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दैनिक गतिविधियों से समाज में संगठन, एकता, प्रेम, बन्धुभाव, देशभक्ति, अनुशासन और समरसता का संचार तो हुआ ही है, इसके साथ-साथ बालों, किशोरों और तरुणों के व्यक्तिगत जीवन में उन्नत चरित्र के संस्कारों का बीजारोपण एवं अंकुर-पल्लवन भी हुआ है। किन्तु यह सब तो संघ-कार्य का समाज पर पड़ने वाला सहज प्रभाव अथवा नित्य परिणाम है। इसके अतिरिक्त भी संघ की स्थापना के एक-दो वर्ष पश्चात् से ही उसके स्वयंसेवकों ने समाज जीवन में उर्ध्वगामी परिवर्तन की कुछ अवसर विशेष पर प्रकट होने वाली भूमिकाएँ भी निभाईं।

जनजीवन पर संघ का प्रभाव

संघ-कार्य का जैसे-जैसे विस्तार हुआ है, समाज में देशभक्ति, एकता की भावना, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय गौरवबोध जैसे गुणों की वृद्धि हुई है। यद्यपि अभी वे पर्याप्त मात्रा में आ गये हैं, ऐसा नहीं कह सकते। उनके लिए अभी और अधिक परिश्रम करना होगा। फिर भी ये तो ऐसे गुण हैं जिनसे संघ-कार्य का सीधा सम्बन्ध है, किन्तु रोचक बात यह है कि संघ के परोक्ष प्रभाव से समाज में नैतिक परिवर्तन की प्रक्रिया को स्पष्ट देखा जा सकता है।
ऐसे उदाहरण विद्यमान हैं कि आवारागर्दी, चोरी, जेब काटने और अपराधिक वृत्ति वालों के लिए जानी जाने वाली पिछड़ी बस्तियों में जब संघ-शाखा प्रारम्भ की गयी तो बिना किसी को कोई उपदेश दिये, प्रेमपूर्वक सहज व्यवहार से ही धीरे-धीरे वहाँ के किशोरों और तरुणों में भी आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया। वे आवारागर्दी और अपराध वृत्ति छोड़ कर तथा स्वयंसेवक बनकर पढ़ने-लिखने में मन लगाने लगे। तरुणों ने परिश्रम करके जीविकोपार्जन करना प्रारम्भ कर दिया। ऐसा इसलिए संभव हुआ कि सम्मानित कुल और आचरण वाले पढ़े-लिखे स्वयंसेवक जब उनके साथ बराबरी और भाईचारे का व्यवहार करते हुए उनकी झुग्गी-झोपड़ी में आकर साथ उठने-बैठने, खेलने, खाने, और देशभक्तिपूर्ण प्रार्थना करने लगे तो उन्हें स्वतः निन्दनीय कार्य करने में लज्जा आने लगी और उनमें शिष्ट समाज का अंग बनने की इच्छा जागृत होने लगी। माता-पिता भी अपने बिगड़े बच्चों में अच्छे संस्कार देखकर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने भी मदिरापान, जुआ जैसे दुर्व्यसन छोड़ दिये।

राष्ट्र-जीवन के विविध क्षेत्रों में स्वयंसेवकों ने जो कार्य प्रारम्भ किये हैं उन्होंने तो उन क्षेत्रों में न्यूनाधिक विचार-क्रान्ति ही ला दी है।

भगवा ध्वज और गुरुदक्षिणा
यज्ञ-वेदी की अग्नि-ज्वाला के रंग का भगवा ध्वज अर्पण (आहुति देने) अर्थात् त्याग का प्रतीक है। इसी कारण यह युगों से भारतीय संस्कृति के उच्च आदर्शों का प्रतीक रहा है। भगवा ध्वज की इस महत्ता को देखते हुए संघ में उसे गुरु का स्थान दिया गया है और प्रतिवर्ष व्यास-पूर्णिमा के दिन उसकी पूजा की जाती है। उस दिन स्वयंसेवक श्रद्धापूर्वक अपनी भेंट ध्वज के आगे अर्पित करते हैं। इसे गुरु-दक्षिणा कहा जाता है। संघ स्वावलम्बी
संगठन है और उसके सभी खर्च इसी राशि से चलते हैं। वर्ष में एक बार स्वयंसेवकों की गुरुदक्षिणा के अतिरिक्त अन्य कोई धन अपने खर्च के लिए संघ स्वीकार नहीं करता। इस व्रत का पालन करते हुए यह संगठन अपने कार्यकताओं को मितव्ययी जीवन जीने को प्रेरित करता है।
संघ व्यक्तिनिष्ठ न होकर तत्त्वनिष्ठ रहे, इसीलिए गुरु के पद पर किसी व्यक्ति को आसीन न करके निर्मल आदर्शों के प्रतीक भगवा ध्वज को यह सम्मान दिया गया। यह ध्वज चिरकाल से भारत के उन्नत गौरव का भी प्रतीक रहा है। हमारे तपोबली, ज्ञानजयी ऋषि-मुनियों से लेकर चक्रवर्ती सम्राटों तथा विश्वविजयी योद्धाओं तक ने इसी ध्वज को आगे रखा। संघ की शाखाओं में प्रतिदिन नियमित रूप से भगवा ध्वज फहराकर उसकी वन्दना की जाती है।

सरसंघचालक
संघ का तीव्र गति से विस्तार होने पर संगठन और अनुशासन की दक्षता तथा ध्येय-पथ पर अविचल प्रगति सुनिश्चित करने के लिए डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार संघ के प्रथम सरसंघचालक मान्य किये गये। अब तक जिन विभूतियों ने यह दायित्व संभाला है उनका कार्यकाल इस प्रकार रहा:-

1. डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार(1925-1940)
2. श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर(1940-1973)
3. श्री मधुकर दत्तात्रेय (बालासाहब) देवरस(1973-1994)
4. प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भय्या)(1994-2000)
5. श्री कुप्पाहल्ली सीतारमय्या सुदर्शन(2000-2009)
6. श्री मोहनराव मधुकरराव भागवत(2009- वर्तमान)




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