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*राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम* 

जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक माधव सदाशिव गोलवलकर जिन्हें गुरुजी के नाम से संबोधित किया जाता है उन्होंने हमेशा "राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम" मंत्र के माध्यम से ये दर्शाने की कोशिश की कि उनका सबकुछ राष्‍ट्र को समर्पित है। ‘इदं न मम’ अर्थात यह मेरा नही है, कुछ भी मेरा नहीं है। संघ के पितृ पुरुष के ये वचन न पहले समझ मे आते थे न आज आते हैं। आखिर संघ के लोगों का क्या समर्पण है राष्ट्र के प्रति, यह पता तो चले? संघ के लोगों का ये कहना कि आरएसएस एक सांस्कृतिक संगठन है इसका राजनीति से कोई लेना देना नही। फिर राजनीति में इतना हस्तक्षेप क्यों? 

"संघे शक्ति कलियुगे" ये संघ का महत्वपूर्ण नारा है। इसका अर्थ है कलियुग में एकता सबसे बड़ी शक्ति है। कोई पूछे संघ से कि आप किसे संगठित करने की बात कर रहे हैं। जब सारा देश संगठित होकर स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बना तब संघ आज़ादी की लड़ाई में शामिल नही हुई। आज देश में साम्प्रदायिकता पैर पसार रही है तो सिर्फ इसी कट्टर विचारधारा की वजह से। हिन्दू को मुसलमान से लड़वा रहे, ईसाइयों को मुसलमान से लड़वा रहे, सामान्य को दलितों से लड़वा रहे। सभी धर्मों, जातियों को छिन्न-भिन्न करके नारा दे रहे संघे शक्ति कलियुगे!

संघ के प्रचारक कहते हैं हमें राजनीति से कोई लेना देना नही, फिर एक पार्टी विशेष के लिए घर-घर प्रचार करने क्यों जाते हैं क्यों देश को गुमराह करते हैं कि यदि बीजेपी सत्ता में नही आई तो 14-15 प्रतिशत मुसलमान 85 प्रतिशत हिंदुओं को घर मे घुसकर मारेंगे। प्रश्न ये है कि क्यों मारेंगे? इस देश मे गांव-गांव में हिन्दू मुसलमान साथ-साथ रह रहे हैं वे सभी मिलकर ईद भी मनाते हैं और दिवाली भी, फिर एक दूसरे को मारेंगे क्यों? संघ बीजेपी के लिए वोट कबाड़ने के उद्देश्य से देश को डराकर, नागरिकों को भीरु बनाने का कुत्सित प्रयास कर रहा है। गंभीर विषय ये है कि लोग इनकी बातों के कुचक्रों में फंसते चले जा रहे हैं। संघ की बातें लोगों को अफीम के नशे की तरह दी जा रही हैं। लोग अब इनकी झूठी मनगढंत बातों को ही सही मान रहे हैं और सच को सिरे से नकार रहे हैं। 

बंगाल में क्या किया, लोगों को लड़वाया न, वोट की खातिर और वहां इंसानियत खत्म करके वोट हासिल कर भी ली। लेकिन इसमें राष्ट्र को क्या समर्पित किया ये बता दे कोई। हिन्दू-मुसलमान की लड़ाई सरकार बनाने के लिए सिर्फ एक पैंतरा मात्र है। खण्ड-खण्ड करके संगठित करने की बात अजीब सी नही लगती। अनेकता में एकता वाली बात किताबों में कहीं धूल खा रही है।

हरिद्वार में एक मात्र भारत माता मंदिर है जिसकी स्थापना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने करवाई। संघ ने राष्ट्र के नाम पर क्या किया? लोग कहते हैं संघ विचारधारा की लड़ाई लड़ रही है। कौन सी विचारधारा, नाथूराम गोडसे की! जिसने महात्मा गांधी जी की हत्या की। संघ के प्रचारक सुनील जोशी की हत्या की साज़िश रचने वाली प्रज्ञा ठाकुर को चुनाव लड़ाने की विचारधारा कौन सी है? जो अपनो के हत्यारों को चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल करलें उनकी विचारधारा स्वार्थहित की हो सकती है राष्ट्रहित की नही।

एक बात और समझ से परे है 2014 में भाजपा ने पूरे देश से जितने वादे किए एक भी पूरे नही किये। महंगाई कम नही हुई, काला धन आया नही, बेरोजगारी बढ़ गई, किसानों की आय दुगनी नही कर पाए। उसके बाद अब 2019 में समूचे देश को छद्म राष्ट्रवाद घोंट-घोंट के पिला दिया। ये बात स्थापित कर दी कि देश सिर्फ मोदी के हाथों सुरक्षित है और फिर से प्रचंड बहुमत की सरकार बना ली। मूल प्रश्न ये है कि इतनी जद्दोजहद करके, लोगों में आपसी वैमनस्यता बढ़ा के सरकार बना भी ली तो करेंगे क्या? कोई ठोस नीति है नही, पिछले 5 वर्षों में विदेश यात्रा और राज्यों में चुनाव लड़ने के अलावा कुछ नही किया। मुझे लगता है बीजेपी ने गुरु जी का वाक्य "राष्ट्राय स्वाहा" का मतलब राष्ट्र को समर्पित करने से नही बल्कि राष्ट्र को स्वाहा यानी नष्ट करने से मान लिया है।

देश की आज़ादी से लेकर उसके निर्माण में हज़ारों-लाखों लोगों ने त्याग और बलिदान दिए इससे कोई भी इंकार नही कर सकता। आज देश मे आरएसएस की विचारधारा ने चुनावी फायदे के लिए पूरा चुनाव गांधी परिवार पर केंद्रित रखा। इसीलिए अब मै आपको बताता हूँ कि देश के लिए गांधी परिवार का क्या योगदान है, मैं बताता हूं गुरु जी के इस मंत्र "राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम" का असल मतलब क्या है। काँग्रेस के 132 साल में 60 राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए जिसमें महात्मा गांधी जी को मिलाकर नेहरू-इंदिरा गांधी परिवार के 7 सदस्य काँग्रेस अध्यक्ष बने। महात्मा गांधी की अगुआई में स्वतंत्रता आंदोलन हुआ। वे उच्च कोटि के बेरिस्टर थे उन्होंने अपना सबकुछ छोड़ दिया इसी देश के लिए। यहां तक कि जब उन्होंने देखा कि देश के नागरिकों के पास तन ढंकने के लिए कपड़े नही है तो उन्होंने अपने वस्त्र त्याग कर ताउम्र एक धोती में गुजार दी। फकीर किसे कहेंगे जिसने ऐशोआराम छोड़कर अपना सर्वस्व देश को दिया या उन्हें जो दिन में 5 बार कपड़े बदलते हैं और लाखों रुपये के कपड़े पहनते हैं। मुझे एक बात कभी समझ में नही आई कि जब आप प्रधानमंत्री बन चुके हो फिर क्यों अपनी माँ को उस छोटे से घर मे छोड़ आए, प्रधानमंत्री निवास में इतने कमरे होते हैं, एक कमरा वो अपनी माँ को दे सकते थे और माँ को अपने घर नही लाना और उसे आप त्याग की संज्ञा दे रहे हो, धिक्कार है आपके बेटे होने पर, ये त्याग नही सिर्फ ढोंग के अलावा कुछ नही। 

काँग्रेस के 2 अन्य अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू ने देश की आज़ादी के लिए अपनी पैतृक संपत्ति देश को समर्पित कर दी। देश के लिए समर्पण का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि पंडित नेहरू स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान करीब 11 साल जेल में रहे। कांग्रेस के 2 अन्य अध्यक्षों इंदिरा गांधी व राजीव गांधी ने राष्ट्रनिर्माण करने में अपने प्राणों की आहुति दे दी। अब आप ही बताइए राष्ट्र को अपना सर्वस्व समर्पण किसने किया। ये वही गांधी परिवार है जिसे कोस-कोस कर मोदी जी ने देश मे 2 बार सरकार बना ली। गुरु जी के मंत्र राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम को वास्तविक व सार्थक स्वरूप कांग्रेस ने दिया है। आज नही तो कल पूरे देश को ये बात समझ आ जायेगी कि किस के हाथ में देश सुरक्षित है।

योगेन्द्र सिंह परिहार

ये जीवन राष्ट्र का है, राष्ट्र को ही अर्पित है, ये मेरा नहीं है’ राष्ट्र को समर्पित । ऐसे मन्त्र के प्रणेता परम् पूज्य माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर की आज जयन्ती है । सादर नमन।

‘राष्ट्र कैसे बनता है?’, प्रत्युत्तर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक प. पू. माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर बताते हैं कि इसकी मोटा मोटी तीन शर्तें हैं, पहली जिस देश में लोग रहते हैं उस भूमि के प्रति लोगों की भावना। दूसरी शर्त है, इतिहास में घटित घटनाओं के सम्बन्ध में सामान भावनाएं। फिर वे भावनाएं आनंद की हों या दुःख की, हर्ष की हो या अमर्ष की। और तीसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त है, समान संस्कृति की। गोलवलकर ने भिन्न भिन्न सन्दर्भों से यह प्रतिपादित किया कि भारतवर्ष एक हिन्दू राष्ट्र है। ‘यह भारतभूमि इसका शरीर है, यह भारत एक अखंड विराट राष्ट्रपुरुष का शरीर है। हम सब उसके छोटे छोटे अवयव हैं, अवयवों के समान हम परस्पर प्रेमभाव धारण कर राष्ट्र-शरीर एकसंध रखेंगें।’

गोलवलकर इसमें आगे जोड़ते हैं कि, ‘वास्तविकता यह है कि ‘हिन्दू शब्द जातिवाचक नहीं है, यह सम्प्रदायवाचक भी नहीं है। अनादि काल से यह समाज अनेक सम्प्रदायों को उत्पन्न करके एक मूल से जीवन ग्रहण करता आया है। उसके द्वारा यहाँ जो समाज-स्वरूप निर्माण हुआ है वह हिन्दू है। भले ही यहाँ अलग-अलग राज हों, राज्य हों, सम्प्रदाय हों, असमानता या भिन्नता हों, पर यहाँ सांस्कृतिक एकता है, सांस्कृतिक एकरूपता है, एकसूत्र व्यावहारिक जीवन है।’

निष्कर्ष रूप में गोलवलकर एक बात पर आते हैं, ‘अपने राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति का जब हम विचार करते हैं, तो हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिंदी समाज का संरक्षण करते हुए ही यह हो सकता है। इसका आग्रह यदि छोड़ दिया तो अपने ‘राष्ट्र’ के नाते कुछ भी नहीं बचता, केवल दो पैरों वाले प्राणियों का एक समूह बचता है… इसलिए हमें पूर्ण निश्चय के साथ यह कहना है, कि हाँ, हम हिन्दू हैं। यह हमारा धर्म, संस्कृति, हमारा समाज है और इनसे बना हुआ हमारा राष्ट्र है। इसी के भव्य, दिव्य, स्वतंत्र और समर्थ जीवन को खड़ा करने के लिए ही हमारा जन्म हुआ है।’

कुलमिलाकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक प. पू. माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर का मानना था कि रीति-रिवाजों, परंपराओं और पूजा के तरीकों के मामले में भारत की विविधता इसकी विशिष्टता थी और यह विविधता मजबूत अंतर्निहित सांस्कृतिक आधार के बिना नहीं थी, जो वास्तविक रूप से इसके मूल में थी। उनका मानना था कि हिंदू अपनी सभी विविधता के साथ, अन्य अवयवों सहित “जीवन के समान दर्शन”, “समान मूल्यों” और “समान आकांक्षाओं” के बीच साझा करते हैं। भारत के मूल निवासियों द्वारा एक सामान्य संस्कृति, इतिहास और वंश को साझा करना ही वास्तव में भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है।

गोलवलकर यह अनायास ही नहीं कहते कि, ‘प्राकृतिक अनेकता से मानसिक एकता की ओर बढ़ने का प्रयास जिस बिंदु पर सफलतापूर्वक समाप्त होता है, उसी बिंदु से राष्ट्रीयता (Nationhood) का प्रारंभ होता है।’

अथर्ववेद(19/41/1) के उद्धरण से यह और भी स्पष्ट हो जाता है:
भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वविर्दः।तपो दीक्षा उपसेदु: अग्रे।।
ततो राष्ट्रं बलं ओजश्म जातम। तदस्मै देवा उपसं नमन्तु।।
अर्थात आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत का कल्याण करने की इच्छा से सृष्टि के प्रारंभ में जो दीक्षा लेकर तप किया, उससे राष्ट्र का निर्माण हुआ, राष्ट्रीय बल और ओज भी प्रकट हुआ। इसलिए सब विविध इस राष्ट्र के सामने नम्र हो, नत होकर इसकी सेवा करें।

गोलवलकर ने अपने प्रेरणादायक जीवन दर्शन, विलक्षण व्यक्तित्व, प्रगाढ़ देशभक्ति और कुशल नेतृत्व से न केवल संघ अपितु पूरे भारतीय समाज व राष्ट्र के रूप में भारतवर्ष के उन्नयन में मन-वचन-कर्म से योगदान दिया। उनके मार्गदर्शन और उनके योगदान की आहुति से भारतवर्ष आज भी उर्ध्वाधर प्रगतिपथ पर गतिमान है।

आज ही के दिन 19 फरवरी 1906 को जन्मे और बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक रहे प. पू. माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर की जयन्ती पर उन्हें कोटिशः नमन्।

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